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अपराधी...🍁


मन मस्तिष्क के मधुर-भाव को 
हमने भी दुत्कार दिया
साथ किया खूनी सर्कस का
गुंडो का सत्कार किया
अपनी पीड़ा को पीने को
उलझी बाजी को सुलझाने
प्रेम-राह से इतर जंग को
हमने सीखे नए तराने
जगती के सब सुख को तजकर
हमने थामा हाथ नवल का
जुर्म राह में पांव पसारे
पीकर कड़वा घूँट गरल का
रंगों के उलझे तिलिस्म में
नित्य नए षड्यंत्र बनाए
उन्मादों की चोटी पर चढ़
संविधान के शोक मनाए
दुखती रग पर हाथ रखें हम 
बेढब-सत्ता को बहलाने
शिक्षा के मंदिर में घुसकर
खड़े किए बेखौफ मुहाने
हमने खींची निज हाथों से
अपने मर्दन की रेखा
उठा धुंध नैतिक शिखरों पर
स्वप्न अभागा ये देखा
नाश करें खुद अपनेपन का
नाश हुआ जग ये सारा
हाथ पसारे घूमे भारत
अपने ही जन का मारा
हे वीर! अगर होगा ऐसा
श्री राम को क्या बतलाओगे
रस प्रेम पगे मनमोहन को
कैसे तुम मुख दिखलाओगे
है समय शेष नव निर्मित कर
खुद से खुद के नव-जीवन को
अपनी आँचल से ढाँप सकल
तपती वसुधा के पीड़न को...।


- Ankesh verma

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घर मे घर..🍁

कभी बँटवारे  तो कभी घर के  भीतरी दीवारों का द्वन्द कभी अपनी अवहेलना तो कभी पिता की तानाशाही से कभी माँ के साथ को अथवा बहन के भीगे नयनों से या अपनी सत्ता स्थापित करने को कई बार खुद से भी बिगड़ते हैं रिश्ते बच्चे जब बड़े हो जाते है घर मे कई घर हो जाते हैं..!                    - अंकेश वर्मा 

ग़ज़ल..🍁

हाथ में हाथ ले साथ चलते हुए जमाने भर की नजरों से संभलते हुए होके तुम में फ़ना मेरी जां सच कहूं तुम्हें चूम ही लूंगा गले मिलते हुए क्या बताऊं तुम कितनी हसीं लग रही  चाँद के करीब से निकलते हुए साथ में मैं रहूं फिर भी दूरी लगे बाँह भर लेना हमको मचलते हुए है हकीकत या है ये सपना कोई ख़्याल आया है यूँ ही टहलते हुए... © Ankesh Verma

में प्रेम माँगने आया हूँ...🍁

कुछ प्रेम भरे आलिंगन हैं कुछ विरह के मारे क्रंदन हैं कुछ यादें मीठी-खट्टी हैं कुछ गीली-पीली चिट्ठी हैं भर झोली उनको लाया हूँ मैं प्रेम मांगने आया हूँ.. कुछ सुप्त व्यथा के वन्दन हैं कुछ प्रेम में भीगे चंदन हैं जेबों में मेरे कंगन हैं जो प्रेम-पगे अभिनंदन हैं दुधमुहे प्रेम का साया हूँ मैं प्रेम मांगने आया हूँ पाने को केवल तुम्हें एक मैं हुआ द्रवित वर्षों अनेक बस केवल तेरा रूप देख खो बैठा हूँ अपना विवेक मैं सहज-व्यक्ति भरमाया हूँ मैं प्रेम मांगने आया हूँ । © अंकेश वर्मा