सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

हमारे किस्से..🍁


उसके आँखो की गुश्ताखियों की जो मनमानी है
मेरा इतिबार करो ये जहां वालों बड़ा शैतानी है.।

किसी के इश्क़ में बेतरतीब हो जाऊं ये आसां तो नही
मेरे किरदार के माफ़िक मेरा इश्क़ भी गुमानी है.।

मेरी कमबख्त आँखें उसके नूर को समेट नही पाती 
उसका अक्स भी कुछ-कुछ परियों सा रूहानी है.।

उसके माथे को चूमती जुल्फ़ें मुझे मदहोश करती हैं 
किसी न किसी रोज़ ये बात उसको बतानी है.।

गर वो मेरे सामने रोए तो मुझे रोने से इनकार नही
मुझे तो अब सिर्फ उसी से निभानी है.।

गर उसे मुझपे एतबार न हो तो कोई आफ़त नही
मैं उसे जाने दूँगा कर्ण सा मेरा इश्क़ भी दानी है..।।

                                               - अंकेश वर्मा

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

घर मे घर..🍁

कभी बँटवारे  तो कभी घर के  भीतरी दीवारों का द्वन्द कभी अपनी अवहेलना तो कभी पिता की तानाशाही से कभी माँ के साथ को अथवा बहन के भीगे नयनों से या अपनी सत्ता स्थापित करने को कई बार खुद से भी बिगड़ते हैं रिश्ते बच्चे जब बड़े हो जाते है घर मे कई घर हो जाते हैं..!                    - अंकेश वर्मा 

ग़ज़ल..🍁

हाथ में हाथ ले साथ चलते हुए जमाने भर की नजरों से संभलते हुए होके तुम में फ़ना मेरी जां सच कहूं तुम्हें चूम ही लूंगा गले मिलते हुए क्या बताऊं तुम कितनी हसीं लग रही  चाँद के करीब से निकलते हुए साथ में मैं रहूं फिर भी दूरी लगे बाँह भर लेना हमको मचलते हुए है हकीकत या है ये सपना कोई ख़्याल आया है यूँ ही टहलते हुए... © Ankesh Verma

क्षणिकाएं...🍁

गनीमत है कि दिन के हर पहर मुझसे अलग-अलग बर्ताव करते हैं... जैसे पक्षी लौट आते हैं अपने बसेरों पर शाम के ढलते ही तुम भी वापस आ जाती हो मेरे ख्वाबों में मेरी शर्तों के साथ.. उजाले कभी भी मेरे साथी नही रहे यही कारण है कि चांदना के पहर से ही तुम मुझसे दूर होने लगती हो... © अंकेश वर्मा