सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

मनमौजी..🍁

वो जो वफ़ा में डूबते हैं किधर जाया करते हैं
सुखन-ए-चंद लम्हों सा गुजर जाया करते हैं.।

ये इश्क़ भी कुछ-कुछ सियासत सा है मख़मूर
जिन्हें कुर्सी मिलती है वो संवर जाया करते हैं.।

सियासत में अब भी होती हैं गुंडों की भर्तियां
वो अलग बात है दिखावे को सब सुधर जाया करते हैं.।

देखो न ये गाँव के लोग अब भी पहले से ही तो हैं
डरते भी नही और अपनों की खातिर डर जाया करते हैं.।

ये सब छोड़ो तुम सुनो न मुझसे मेरे महबूब के किस्से
हम उसे देखते ही गोया मर जाया करते हैं.।

जब वो हमसे पूछती है कि क्या तुम्हें हमसे इश्क़ है
हम अपनी धुन के पक्के हैं हर बार मुकर जाया करते हैं.।

वैसे इस जहां में ये इश्क़ भी हैरतअंगेज ही है
कैसे भी मिलते है और कहीं भी बिछड़ जाया करते हैं..।।

                                                     - अंकेश वर्मा

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

घर मे घर..🍁

कभी बँटवारे  तो कभी घर के  भीतरी दीवारों का द्वन्द कभी अपनी अवहेलना तो कभी पिता की तानाशाही से कभी माँ के साथ को अथवा बहन के भीगे नयनों से या अपनी सत्ता स्थापित करने को कई बार खुद से भी बिगड़ते हैं रिश्ते बच्चे जब बड़े हो जाते है घर मे कई घर हो जाते हैं..!                    - अंकेश वर्मा 

ग़ज़ल..🍁

हाथ में हाथ ले साथ चलते हुए जमाने भर की नजरों से संभलते हुए होके तुम में फ़ना मेरी जां सच कहूं तुम्हें चूम ही लूंगा गले मिलते हुए क्या बताऊं तुम कितनी हसीं लग रही  चाँद के करीब से निकलते हुए साथ में मैं रहूं फिर भी दूरी लगे बाँह भर लेना हमको मचलते हुए है हकीकत या है ये सपना कोई ख़्याल आया है यूँ ही टहलते हुए... © Ankesh Verma

क्षणिकाएं...🍁

गनीमत है कि दिन के हर पहर मुझसे अलग-अलग बर्ताव करते हैं... जैसे पक्षी लौट आते हैं अपने बसेरों पर शाम के ढलते ही तुम भी वापस आ जाती हो मेरे ख्वाबों में मेरी शर्तों के साथ.. उजाले कभी भी मेरे साथी नही रहे यही कारण है कि चांदना के पहर से ही तुम मुझसे दूर होने लगती हो... © अंकेश वर्मा