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समाज

मेरे जन्म से पहले पड़ोसी ने मांगी
मेरे भाई के मृत्यु की दुआ
जब हम स्कूल गए
तब हमें ताश के पत्तो में उलझाया गया
जब होस्टल गए
तब हुई कोशिश हमें बर्बाद करने की
पिता की नौकरी में
कइयों ने डाला अड़ंगा
कोशिश की गई हमसे
हमारी जमीन छीनने की
हमारे अच्छे नम्बर आने पर
हमें गालियां दी गई
हम वंचित रहे
अपने कई संवैधानिक अधिकारों से
पिता ने फसलें बोई
कुछ ने उन्हें जलाया
पिता ने संघर्ष किया
कुछ सफलताएं मिली
जीवन के कई बसन्त के बाद
पिता के संघर्षों
और उनकी स्नेहिल छाया में
हम अपनी समृद्धि को लालायित हुए
हुए उत्सुक व्यवस्थाओं को जानने को,
समझने को
हमने कई सपने देखे,
समृद्धि के सपने,
खुशहाली के सपने,
हमारे सपने सिर्फ हमारे
लेकिन पिताजी को
संतोष नही था
एक दिन यकायक
शिक्षा पर बहस के दौरान
उनके माथे पर उभरी थी
गंभीरता की रेखाएं
उन्होंने कहा था -
कि तुम्हारी शिक्षा केवल हमारी समृद्धि के लिए नही
अपितु आवश्यक है समाज की प्रगति के लिए भी ।
मैं अवाक था...
कौन सा समाज ?
किसकी प्रगति ?

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