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संदेश

लाइट कैमरा एक्शन..🍁

दर्शनशास्त्र का एक बड़ा ही खूबसूरत वाक्य है कि दुनिया एक रंगमंच है और सभी मनुष्य इस रंगमंच के कलाकार हैं । हर व्यक्ति को चाहिए कि वो अपने किरदार का निर्वहन उचित तरीके से करे । इस मंच का सबसे रोचक पहलू यह है कि यहां कोई निर्देशक नही होता है जो कलाकारों की भूमिका को बताने का कार्य करता हो , यहां हर कलाकार स्वतंत्र होता है, अपने मनमुताबिक अपना किरदार चुनने को । किरदारों को गढ़ने के लिए आपके लिए कैमरा और स्पॉटलाइट बहुत ज्यादा जरूरी है । आपको चाहिए कि आप हमेशा कैमरा और स्पॉटलाइट के ही घेरे में रहे क्योंकि यही रंगमंच पर आपकी दमदार उपस्थिति को तय करता है । ये कैमरा और स्पॉटलाइट फिल्मों के कैमरा या स्पॉटलाइट से इतर आपके कर्तव्यों और कर्मों के मध्य झूला झूलते हुए प्रतीत होते हैं । आपके कर्तव्य और कर्म ही हैं जो आपको रंगमंच का हीरो और विलेन बताने में सहायक होते हैं । तो प्रयास करते रहिए रंगमंच पर बने रहने के लिए, स्पॉटलाइट में बने रहने के लिए और रंगमंच के प्रमुख कलाकार के रूप में राम,लक्ष्मण,भरत और सीता बनने की खातिर । अगर आप ऐसा नही कर पाते हैं तो आप एक सहायक अभिनेता के रूप में देखे जाते...

तुम्हारा मिलना...🍁

तुम्हारा मुझसे मिलना, मृत्यु सा सुखदायी था  जहाँ सभी दुख तजे जाते हैं, जहाँ परमात्मा की आस होती है, जहाँ नश्वरता को त्याग कर  अमरता की राह मिलती है  तुम मुझे तभी मिली  जब मैं सिर्फ  तुम्हारा होना चाहता था । © ANKESH VERMA

असीमित इच्छाएं ...🍁

तुम्हारे अविश्वास की कालकोठरी में मैं अनहोनी को होनी मानता था तुम्हारा होना सावन का आभासी था मैं तुमसे मिलकर, अपना सर्वस्व खोना चाहता था ठीक उसी भांति, जैसे ओस की बूंद सूखकर खो देती है अपना स्वरूप पुनः सृष्टि के निर्माण को । © ANKESH VERMA

अपराधी...🍁

मन मस्तिष्क के मधुर-भाव को  हमने भी दुत्कार दिया साथ किया खूनी सर्कस का गुंडो का सत्कार किया अपनी पीड़ा को पीने को उलझी बाजी को सुलझाने प्रेम-राह से इतर जंग को हमने सीखे नए तराने जगती के सब सुख को तजकर हमने थामा हाथ नवल का जुर्म राह में पांव पसारे पीकर कड़वा घूँट गरल का रंगों के उलझे तिलिस्म में नित्य नए षड्यंत्र बनाए उन्मादों की चोटी पर चढ़ संविधान के शोक मनाए दुखती रग पर हाथ रखें हम  बेढब-सत्ता को बहलाने शिक्षा के मंदिर में घुसकर खड़े किए बेखौफ मुहाने हमने खींची निज हाथों से अपने मर्दन की रेखा उठा धुंध नैतिक शिखरों पर स्वप्न अभागा ये देखा नाश करें खुद अपनेपन का नाश हुआ जग ये सारा हाथ पसारे घूमे भारत अपने ही जन का मारा हे वीर! अगर होगा ऐसा श्री राम को क्या बतलाओगे रस प्रेम पगे मनमोहन को कैसे तुम मुख दिखलाओगे है समय शेष नव निर्मित कर खुद से खुद के नव-जीवन को अपनी आँचल से ढाँप सकल तपती वसुधा के पीड़न को...। - Ankesh verma

धर्मयुद्ध...🍁

जन-जन के जी गहराते हैं हम मनुष्य जान न पाते हैं हे कृष्ण जहाँ तुम रहते हो मस्जिद से तुमको डर है क्या... क्या वहाँ नही कोई गिरजा  या चादर से लिपटी माटी है केवल यज्ञों की वेदी या जलती बस घी की बाती क्या कोई टोपीधारी भी आता नही है अनायास क्या हम जैसे मानुष के जस करते रहते तुम ये प्रयास की अपनी धरती पर हम  देंगे न तुमको दिवा-याम क्या धर्म की नंगी तलवारों से छिड़ा हुआ ये संग्राम क्या तुम भी बाबर माफ़िक हो या मिशनरियों के मधुर लोभ क्या सच में तुम भूले प्रेम करते रहते उन पर क्रोध हे कान्हा गर ये मिथ्या है तो मानूँ क्या मैं नव पथ को ले साथ सभी रंगों को मैं चढ़ जाऊं धर्म सुपथ रथ को मैं निर्बल हूँ जो अपनों को रंगों में बांटा पाता हूँ गर करूँ प्रेम सब धर्मों को कायर कहलाया जाता हूँ हे कृष्ण तुम्हीं बतलाओ अब कोई उचित मार्ग दिखलाओ अब  धर्म-धर्म की जय-जय कर  उत्पात मचा न पाउँगा कटती है गर्दन कटे मगर मैं धर्म नही ला पाऊंगा..। - अंकेश वर्मा

जामुन का पेड़..🍁

रात को बड़े जोर का अंधड़ चला। सेक्रेटेरिएट के लॉन में जामुन का एक पेड़ गिर पडा। सुबह जब माली ने देखा तो उसे मालूम हुआ कि पेड़ के नीचे एक आदमी दबा पड़ा है। माली दौड़ा दौड़ा चपरासी के पास गया, चपरासी दौड़ा दौड़ा क्‍लर्क के पास गया, क्‍लर्क दौड़ा दौड़ा सुपरिन्‍टेंडेंट के पास गया। सुपरिन्‍टेंडेंट दौड़ा दौड़ा बाहर लॉन में आया। मिनटों में ही गिरे हुए पेड़ के नीचे दबे आदमी के इर्द गिर्द मजमा इकट्ठा हो गया। ‘’बेचारा जामुन का पेड़ कितना फलदार था।‘’ एक क्‍लर्क बोला। ‘’इसकी जामुन कितनी रसीली होती थी।‘’ दूसरा क्‍लर्क बोला। ‘’मैं फलों के मौसम में झोली भरके ले जाता था। मेरे बच्‍चे इसकी जामुनें कितनी खुशी से खाते थे।‘’ तीसरे क्‍लर्क का यह कहते हुए गला भर आया। ‘’मगर यह आदमी?’’ माली ने पेड़ के नीचे दबे आदमी की तरफ इशारा किया। ‘’हां, यह आदमी’’ सुपरिन्‍टेंडेंट सोच में पड़ गया। ‘’पता नहीं जिंदा है कि मर गया।‘’ एक चपरासी ने पूछा। ‘’मर गया होगा। इतना भारी तना जिसकी पीठ पर गिरे, वह बच कैसे सकता है?’’ दूसरा चपरासी बोला। ‘’नहीं मैं जिंदा हूं।‘’ दबे हुए आदमी ने बमुश्किल कराहते हुए कहा। ‘’...

गज़ल...🍁

ये मैं कैसे व्यूह में उतर गया वक्त ने मारा या मैं सुधर गया तेरी मोहलत दरियादिली थी तेरी रुसवाई से मैं बिखर गया मेरे दोस्त ने पूछा था तेरे इश्क़ को मैं टूट गया था इसलिए मुकर गया तुझसे मुलाकातें कभी रास न आई सो न तेरे पास ठहरा न घर गया जहाँ से परिंदे तेरी खबर लाते थे मैं वक्त का मारा इधर गया उधर गया तेरी सांसों की दरीचे की खोज में रहा तेरे साथ को मचला मैं जिधर गया तुझे न देखा तो पीर आंखों में उतर आई तुझे सोचा तो गला भर गया..। © अंकेश कुमार वर्मा