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अच्छा हुआ...

तुझे भी तुझ सा मिला 
अच्छा हुआ
तुझसे बात की और चुप भी रहा
अच्छा हुआ
मेरी दुखती रिसती रग भी
तुझे बद्दुआ न दे पाई
फिर भी जो न सोचा वो हुआ
अच्छा हुआ
सुना है वो कहानियों का 
शौकीन नही है
तुम्हारे साथ तो है
पर तुम्हारे साथ का
शौकीन नही है
वो सुनकर भी तुम्हे 
अनसुना करता है
अच्छा हुआ
वादा दूर का किया है
उसने तुम्हे नही 
तुम्हारा जिस्म जिया है
तुम रोती हो 
तो मनाता भी नही
अच्छा हुआ
तुझे भी तुझ सा मिला
अच्छा हुआ
तुझसे बात की और चुप भी रहा
अच्छा हुआ...!

           -अंकेश वर्मा

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घर मे घर..🍁

कभी बँटवारे  तो कभी घर के  भीतरी दीवारों का द्वन्द कभी अपनी अवहेलना तो कभी पिता की तानाशाही से कभी माँ के साथ को अथवा बहन के भीगे नयनों से या अपनी सत्ता स्थापित करने को कई बार खुद से भी बिगड़ते हैं रिश्ते बच्चे जब बड़े हो जाते है घर मे कई घर हो जाते हैं..!                    - अंकेश वर्मा 

क्षणिकाएं...🍁

गनीमत है कि दिन के हर पहर मुझसे अलग-अलग बर्ताव करते हैं... जैसे पक्षी लौट आते हैं अपने बसेरों पर शाम के ढलते ही तुम भी वापस आ जाती हो मेरे ख्वाबों में मेरी शर्तों के साथ.. उजाले कभी भी मेरे साथी नही रहे यही कारण है कि चांदना के पहर से ही तुम मुझसे दूर होने लगती हो... © अंकेश वर्मा

विफलता २

 कुछ पुण्य न अर्जित किया  कुछ साध्य साधन चुक गए कुछ सुरम्य दिन भी  दीपक किनारे छिप गए देखता हूँ वक्त बीते  मैं कहाँ था सोचता हो जीव कोई मैं उसे गिद्धों समान नोचता स्वयं, स्वयं को देखकर भ्रमित हो जाता हूँ रत्न सारे हारता हूँ...२ x