सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

क्षणिकाएं...🍁

गनीमत है कि दिन के हर पहर
मुझसे अलग-अलग बर्ताव करते हैं...

जैसे पक्षी लौट आते हैं अपने बसेरों पर
शाम के ढलते ही तुम भी वापस आ जाती हो
मेरे ख्वाबों में मेरी शर्तों के साथ..

उजाले कभी भी मेरे साथी नही रहे
यही कारण है कि चांदना के पहर से ही
तुम मुझसे दूर होने लगती हो...

© अंकेश वर्मा

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

ग़ज़ल..🍁

हाथ में हाथ ले साथ चलते हुए जमाने भर की नजरों से संभलते हुए होके तुम में फ़ना मेरी जां सच कहूं तुम्हें चूम ही लूंगा गले मिलते हुए क्या बताऊं तुम कितनी हसीं लग रही  चाँद के करीब से निकलते हुए साथ में मैं रहूं फिर भी दूरी लगे बाँह भर लेना हमको मचलते हुए है हकीकत या है ये सपना कोई ख़्याल आया है यूँ ही टहलते हुए... © Ankesh Verma

रेहाना..🍁

दोपहर का वक्त और धूप बादलों के साथ लुकाछिपी खेल रही थी..! दो दिन से बारिश के आसार थे जो अब तक आसार ही बने हुए थे हकीकत से बहुत दूर । बाहर नीम पर कौवे की काँव काँव दोपहर को और भी कर्कश बना रही थी । सरकारी नल के नीचे बैठी रेहाना बर्तन धुलने के साथ चेहरे पर आती जुल्फों को एक ताल से हटाती जा रही थी । कालिख लगे हाथों से बार बार बालों को हटाने के क्रम में हर बार उसके गोरे मुखड़े पर कालिख लग जाती जो उसके चेहरे पर इस समय नजरबट्टू का काम कर रही थी । रेहाना के परिवार में कुल आठ जन थे , उसके अब्बू-अम्मी ,  तीन भाई और उसे लेकर तीन बहन । परिवार की स्थिति नाजुक ही कही जाएगी , पिता दो बेटों के साथ लुधियाना में कपड़े सिलते थे , बड़ा बेटा मेराज गांव का चौकीदार था जिसे हजार रुपये मिलते थे और साथ ही साथ वह गांव के बाहुबली सोमेश सिंह की गाड़ी चलाता था..। घर का खर्चा बस किसी तरह से चल रहा था । बर्तन धोती रेहाना को अचानक स्मरण हुआ कि कल झाड़ू लगते समय चूल्हा टूट गया था जिसे सही करने के लिए तालाब से चिकनी माटी भी लाना है । माँ होती तो शायद आज उसका काम बंट जाता लेकिन वो परिवार के अन्य लोग...