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आहट...🍁

( अर्जुन और दुर्योधन दोनों को होने वाले युद्ध मे सहायता का वचन देकर कृष्ण ने विदा किया । तत्पश्चात सेनापति सात्यकि को अर्जुन और दुर्योधन से हुई बातचीत का सारांश बताया )


सेनापति सात्यकि ने कृष्ण से प्रश्न किया...
प्रभु क्या सच मे आप इस महाविनाश को नही रोक पाए हैं ?
नही बिल्कुल भी नही । ( कृष्ण ने बड़ी ही मधुरता के साथ उत्तर दिया )
मगर ऐसा क्यों, आप तो समस्त लोकों के स्वामी हैं, ऐसी कोई भी  घटना इस सृष्टि में घटित नही हो सकती जिसके लिए आप आदेश न करें फिर ये युद्ध आप के रोकने से क्यों नही रुक सकता ?
शांत खड़े भगवान कृष्ण के माथे पर थोड़ी सी शिकन आई और वो पालथी मारकर वहीं जमीन पर बैठ गए । अपने आँखों को बड़ी ही कोमलता से बंद किया और फिर बड़ी तेजी से खोलते हुए गंभीर शब्दों में कहना शुरू किया...
हे सेनापति सात्यकि,
संसार का कोई भी ममनुष्य चाहे वो पुरुष हो अथवा स्त्री, किसी देव अथवा असुर का गुलाम नही होता वह केवल और केवल अपने कर्मों का गुलाम होता है । हम देव और असुर मनुष्य के कर्मों का परिणाम होते हैं । मानवीय कर्म ही वो एकमात्र कारण है जिनसे देवों और दैत्यों की उत्पत्ति होती है, इस प्रकार देवता या असुर मानव के धर्म और अधर्म से संबंधित कर्मों के गुलाम होते हैं और उन कर्मों का एक निश्चित प्रतिफल होता है जो मानव को प्राप्त होता है ।
देवों और असुरों के उत्पत्ति की भांति घटनाएं भी मानव के कर्मो का ही परिणाम होती हैं अतः उन्हें रोकना किसी देवता या असुर के वश में नही होता है बल्कि घटनाएं तो स्वयं दैवीय होती हैं ।
यही कारण है कि कोई भी देवता समय और  होने वाली घटनाओं पर नियंत्रण स्थापित नही कर सकता है, ये घटनाएं मनुष्य के कर्म हैं जिनका एक निश्चित परिणाम है जो अवश्यसंभावी भी हैं ।
कौरवों और पांडवों के मध्य होने वाले भीषण युद्ध से विनाश उनके कर्मों का ही परिणाम है, उसे खत्म करने के लिए धर्म प्रयास मात्र कर सकता है, अगर धर्म हावी रहा तो विनाश नही होगा लेकिन अधर्म हावी रहा तो विनाश निश्चित है । 
इस विनाश को कौरवों और पांडवों के उन कर्मों ने अवश्यसंभावी बना दिया है जो अधर्म के हाथों को मजबूत और धर्म के प्रयासों को कमजोर कर रहे हैं ।
धृतराष्ट्र के विवाह के समय उनके के अंधें होने को छुपाना , कंधार नरेश शकुनि का हस्तिनापुर को खत्म करने का प्रण, कौरवों की पांच पांडवों के प्रति ईर्ष्या, योग्य युधिष्ठिर को राजा ना बनाना , द्रोण का अपमान , कर्ण का अपमान , कर्ण का धर्म से विमुख होना, युधिष्ठिर द्वारा अपने अनुजों संग अपनी पत्नी द्रौपदी को जुए में दांव पर लगाना , भरे दरबार मे द्रौपदी का चीरहरण, बलपूर्वक स्त्रियों का अपहरण आदि ऐसे ही कुछ कारण है वो इस विनाश को अवश्यसंभावी बना रहे हैं जिसे रोकना अब धर्म के वश में नही रहा है ।
भगवान कृष्ण के मुख से झरते पुष्प रूपी शब्दों से सेनापति के अचेतन मन में चेतना का प्रसार हुआ..
उसने पुनः प्रश्न किया तो क्या वचन में बंधने वाला मनुष्य धर्म के लिए वचन को तोड़ सकता है या कर्तव्य धर्म के आड़े आये तो दोनों में से किसे चुनना चाहिए ?
कृष्ण ने कहा कि यह उस व्यक्ति के  स्वयं के विवेक पर निर्भर करता है, अपने कर्तव्यों और वचनों को निभाना ही धर्म ही है लेकिन अगर इन्हें निभाने से अधर्म बल मिलता है तो  निश्चित रूप से वह व्यक्ति निंदा का भागी होगा।
( कृष्ण के वचनों को सुनकर सेनापति सात्यकि के आंखों से आंसुओं का तूफान उमड़ने लगा जो सत्य को जान लेने के पश्चात आंखों से बगावत कर बैठे थे )
उसी क्षण सात्यकि ने प्रण किया की वो कृष्ण द्वारा दुर्योधन को पूरी सेना सौंपने के वचन के बावजूद युद्ध मे पांडवों के ओर से सम्मिलित होगा ।

( और अचानक कमरे में आहट हुई , शायद मेरे मित्र ने ट्यूबलाइट का स्विच ऑन किया था, मैं मेज पर था और मेरे हाथों में समाचारपत्र था जिसमें लिखे *कोरोना* शब्द भीगे हुए थे )

- Ankesh Verma

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