सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

मैं से मानवता तक..🍁

मेरा मन अन्तःगामी है
दुःख क्यों मेरा अनुगामी है 
बीती यादें भरसक आती
संग अपने अंदेशा लाती
मैं बुद्ध बना अड़ जाऊँगा
बन ठूंठ वहीं गड़ जाऊँगा
हैं रातें छिछली सांझ सजर
मैं देखूं किंचित भोर निर्झर 
सपनों को जो संभाल सकूँ
सबके दुख को यदि बाँट सकूँ
दे संबल हर वंचित-जन को
मैं स्वयं सिद्ध हो जाऊँगा
गर ये सब कुछ कर पाया तो
मानव हरगिज कहलाऊंगा...।

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

घर मे घर..🍁

कभी बँटवारे  तो कभी घर के  भीतरी दीवारों का द्वन्द कभी अपनी अवहेलना तो कभी पिता की तानाशाही से कभी माँ के साथ को अथवा बहन के भीगे नयनों से या अपनी सत्ता स्थापित करने को कई बार खुद से भी बिगड़ते हैं रिश्ते बच्चे जब बड़े हो जाते है घर मे कई घर हो जाते हैं..!                    - अंकेश वर्मा 

ग़ज़ल..🍁

हाथ में हाथ ले साथ चलते हुए जमाने भर की नजरों से संभलते हुए होके तुम में फ़ना मेरी जां सच कहूं तुम्हें चूम ही लूंगा गले मिलते हुए क्या बताऊं तुम कितनी हसीं लग रही  चाँद के करीब से निकलते हुए साथ में मैं रहूं फिर भी दूरी लगे बाँह भर लेना हमको मचलते हुए है हकीकत या है ये सपना कोई ख़्याल आया है यूँ ही टहलते हुए... © Ankesh Verma

क्षणिकाएं...🍁

गनीमत है कि दिन के हर पहर मुझसे अलग-अलग बर्ताव करते हैं... जैसे पक्षी लौट आते हैं अपने बसेरों पर शाम के ढलते ही तुम भी वापस आ जाती हो मेरे ख्वाबों में मेरी शर्तों के साथ.. उजाले कभी भी मेरे साथी नही रहे यही कारण है कि चांदना के पहर से ही तुम मुझसे दूर होने लगती हो... © अंकेश वर्मा