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संदेश

मेरे कमरे को शिकायत रहती है....

चटकीले रंगों और स्याह रात से शालीन और बेबुनियादी बात से बिना चाय के सुबह के शुरुआत से मेरे कमरे को शिकायत रहती है हैरान और बोझिल लोगों से बिदकते और ख़ामोश जुबानों से और मेरे खुद के एकाकीपन से भी मेरे कमरे को शिकायत रहती है बेतरतीब न हो सलीके से रखे कपड़ों से कलमों का कम होना या न होना और मेज पर हिन्दी उपन्यास की गैरमौजूदगी से मेरे कमरे को शिकायत रहती है जब दिन भर गुम हो शाम को वापस आता हूँ जब बिना वजह मैं आधी रात तक जगता हूँ  बिना वजह मौसम को कोसने से भी मेरे कमरे को शिकायत रहती है..!                                - अंकेश वर्मा

कुछ लोग मिले थे राहों में

कुछ लोग मिले थे राहों में कुछ ख्वाब बुने थे राहों में पर टूटे सपने अपने भी कुछ छूटे सपने अपने भी कब तक उपरि तह से सब जुड़े रहेंगे मुझ जैसों से कब तक होंगी बातें मीठी प्रेम सरीखी मुझ जैसों से सब होते है खेल यहाँ रिश्तों के धागे कच्चे हैं है नही अमानत ये अपनी नही यहाँ सब सच्चे हैं कोई कब तक न मुरझाएगा कोई कब तक जी बहलाएगा इस मंजर को झुक जाना है ये अंत कभी तो आना है ये अंत कभी तो आना है..!                 - अंकेश वर्मा  

उधेड़बुन..🍁

कभी कभी सोचता हूँ काम न मिले वही बेहतर होगा मैं दिनभर मजदूरी कर लूँगा और रात में किसी सड़क किनारे कहीं रोशनी में बैठ लिखूँगा अपने और अपने जैसों की भूख को कि ठंड में सड़क किनारे कैसे सोया जाता है और कैसे न चाहते हुए भी जगना पड़ता है रात भर सवारी को ढोने के लिए ताकि सुबह का खाना नसीब हो पर मुझे लगता है तब भी मैं नियति के सामने एक शर्त रखूँगा कि तुम रोज शाम आओगी चाँदनी की तरह  मेरे माथे को छू  मेरी थकान को हरने..!               - अंकेश वर्मा

अनायास🍁

चाँदनी रातों ने भी अपने लिबास बदल दिए तब हमने भी अपने अहसास बदल दिए अब कौन करे बार-बार इस घर की मरम्मत इसलिए हमने इसके असास बदल दिए कौन रोये इस ज़हां में एक शख्स की खातिर और क्यों रोये ये ज़हां किसी शख्स की खातिर पनाह नसीब नही यहाँ अपनो की बस्ती में ये सोच हमने भी अपने ग़मगुस्सार बदल दिए सुकूँ न मिला ये मख़मूर अपने गुलिस्तां में भी इसलिए हमने अब अपने गुलजार बदल दिए..!                                            - अंकेश वर्मा

ख़्वाब💖

नव नूतन सी उसकी आभा चंचल मृग नयनों वाली नदिया सा बलखाता यौवन गालों पर खिलती लाली सूरत जैसे चन्द्र चाँदनी नागिन सी चोटी उसकी मानसरोवर जैसा तन है पुष्प लता उसकी बाली  परियों की प्रतिच्छाया सी है वो मेरे ख्वाबों वाली..।।                   - अंकेश वर्मा

गाँव💖

गाँव देखने आये हो..! क्या कहा..थोड़ा जोर से कहो.. गाँव पर लिखना भी  चाहते हो..?? ठीक है लिखना जरूर लिखना.. किन्तु मेरी इक फरियाद है.. जब तुम लिखना तो ये जरुर लिखना... कि किस भांति यहाँ पलते है बच्चे गाँव भर के लोगों के हाथों से लिखना की बूढ़े यहाँ भार नही है अपितु परिवार की सबसे खास कड़ी हैं लिखना की माँ यहाँ शब्द न होकर संसार है यहाँ पिता बच्चों को पीटता भी है  क्योंकि उसे उनके सुनहरे कल की चिंता है बहन यहाँ केवल राखी के दिन नही होती बल्कि वह छाया है भाई के जीवन का लिखना वो जो चावल होता है  वो असल मे धान है जो तुमको नही पता लिखना भरी दुपहरी में किसान के टपकते पसीने बताना की बच्चे खप गए है  पढ़ाई और कंचे छोड़ भट्ठे की आंच में बंसी की माँ को भी लिखना  जिसका इकलौता बेटा उसकी दवा के पैसे लेने  गया है शहर उसे बुढ़ापे में अकेला छोड़ लोग मर रहे है बिना अपनी उम्र पूरी किये जिनके घर वालो को ये भी नही है मालूम कि मर्ज क्या थी बताना की यहाँ अब सामन्तवाद नही रहा बस बाबू साहब की शादी में खाने के लिए दिन भर काम करना है गरीब को और सबसे अंत म...

तुम आज आई ही हो तो सुनती जाओ..🍁

तुम आज आई ही हो तो मेरी भी कुछ सुनती जाओ मेरे हसरतों के कुछ अनकहे किस्से सुनती जाओ कभी कभी ये रातें भी दिल में काटें सी चुभती हैं तुम्हारी बेरुखी ही सही इन्हें थोड़ा तुम भी चुनती जाओ ये गमगीन शामें अब मुझे बहुत रुलाती हैं भीड़ जब-तब दिल का तपन बढ़ाती है खुशियां तो रूठी है हमसे बस दुख ही बचे है तुम जाओगी ये तय है , थोड़े दुख तुम भी लेती जाओ अहसान फरामोश से लगते है ये ज़माने वाले सुनाते तो है , सुनते नही मेरी ये ज़माने वाले मेरी खुशी और दुख की ये परवाह नही करते मीठे बोल न सही माना , तुम थोड़ा झगड़ा ही करती जाओ बेमतलब का झगड़ना और फिर मान जाना पल भर में अब हमसे ये ना होगा तुम ये भी सुनती जाओ मेरी हसरतों के कुछ अनकहे किस्से सुनती जाओ तुम आज आई हो तो मेरी भी कुछ सुनती जाओ..!!                                       -अंकेश वर्मा