दोपहर का वक्त और धूप बादलों के साथ लुकाछिपी खेल रही थी..! दो दिन से बारिश के आसार थे जो अब तक आसार ही बने हुए थे हकीकत से बहुत दूर । बाहर नीम पर कौवे की काँव काँव दोपहर को और भी कर्कश बना रही थी । सरकारी नल के नीचे बैठी रेहाना बर्तन धुलने के साथ चेहरे पर आती जुल्फों को एक ताल से हटाती जा रही थी । कालिख लगे हाथों से बार बार बालों को हटाने के क्रम में हर बार उसके गोरे मुखड़े पर कालिख लग जाती जो उसके चेहरे पर इस समय नजरबट्टू का काम कर रही थी । रेहाना के परिवार में कुल आठ जन थे , उसके अब्बू-अम्मी , तीन भाई और उसे लेकर तीन बहन । परिवार की स्थिति नाजुक ही कही जाएगी , पिता दो बेटों के साथ लुधियाना में कपड़े सिलते थे , बड़ा बेटा मेराज गांव का चौकीदार था जिसे हजार रुपये मिलते थे और साथ ही साथ वह गांव के बाहुबली सोमेश सिंह की गाड़ी चलाता था..। घर का खर्चा बस किसी तरह से चल रहा था । बर्तन धोती रेहाना को अचानक स्मरण हुआ कि कल झाड़ू लगते समय चूल्हा टूट गया था जिसे सही करने के लिए तालाब से चिकनी माटी भी लाना है । माँ होती तो शायद आज उसका काम बंट जाता लेकिन वो परिवार के अन्य लोग...