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साँझ💖


किसी अनजान सुखन को
भर उठता है मन
चांदना के पहर से ही,
गुजरता है उन्मादी सूर्य
उल्लास की खोज में
चाँद से मिलने की खातिर,
यूँ साँझ उतरती है दिल में...
मानो ओस की बूंदे भिगो रही हों
धरा के वक्ष स्थल पर लेटी दूब को..!
मिल रही हो बेजान प्रेयसी जैसे
स्वप्न में अपने प्रियतम से..!

-अंकेश वर्मा

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घर मे घर..🍁

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क्षणिकाएं...🍁

गनीमत है कि दिन के हर पहर मुझसे अलग-अलग बर्ताव करते हैं... जैसे पक्षी लौट आते हैं अपने बसेरों पर शाम के ढलते ही तुम भी वापस आ जाती हो मेरे ख्वाबों में मेरी शर्तों के साथ.. उजाले कभी भी मेरे साथी नही रहे यही कारण है कि चांदना के पहर से ही तुम मुझसे दूर होने लगती हो... © अंकेश वर्मा

विफलता २

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