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संदेश

माँ...💖

रात्रि का भोर  बसन्त-पंचमी का त्योहार रिमझिम बारिश  पीपल की ऊंची डाल पर लटकता झूला झूले पर अट्ठहास करती बालाएं फूल से गुंथे डंडे लिए  शरारती बच्चों की टोली और इन सब को  देख कर भी अनदेखा करते एक पिता द्वार पर चहलकदमी कर रहे थे कुछ उलझे हुए से थे अचानक एक नन्ही किलकारी गूंजी इसी किलकारी में  घर के लोगों ने देखे भिन्न-भिन्न सपने पिता ने देखा - अपने वंश का एक और चिराग जो फलित करेगा उनके सपनों को भाई को दिखा  एक नन्हा सा जादुई खिलौना बहन को दिखी इक और कलाई.. वो माँ ही थी जिसने लिया फैसला  अपनी उम्र को और लंबा करने का अपनी नन्ही जान की खातिर...!                              - अंकेश वर्मा

तरक्की...?

तुम्हारे घर के पिछले दरवाज़ों से आती हुई अंग्रेजी शराब की बोतलें मेरी नज़र में हैं सामने के दरवाजे से चाहे कितनी भी चकाचौंध घुसे वो काफी नही है  मुझे अंधा करने को दिखते हैं मुझे तुम्हारे दालानों में बैठे अफसर जो कर चुके है अपने ज़मीर का सौदा तुम्हारी मुफ्त की शराब के लिए मैं देख सकता हूँ तुम्हारी दालान के नाच-गानों और बदहवास पिछले कमरों में एक मजबूर स्त्री के ठुमकों के बीच गाँव के सैकड़ो लोगों के जीवन के मोलभाव को उनके अधिकारों की  सस्ती कीमतों को  मिट्टी की पगडंडियों पर ईंटों के चमचम से ऊपर  हम देख नही पा रहे हैं अपनी तरक्की को बस एक निवेदन है अपने दालानों को देखने देना हम गाँव वालों को भी ताकि हमें भी आभास हो अपनी बदलती परिस्थितियों का...!                        -अंकेश वर्मा

प्रेम..💖

प्रेम चुनता है  नित नए पत्ते कुछ गिरते है  कुछ देते हैं.. थोड़ी देर सहारा कुछ बलि चढ़ते है पूजा-पाठ के कुछ ठिठोली में

अच्छा हुआ...

तुझे भी तुझ सा मिला  अच्छा हुआ तुझसे बात की और चुप भी रहा अच्छा हुआ मेरी दुखती रिसती रग भी तुझे बद्दुआ न दे पाई फिर भी जो न सोचा वो हुआ अच्छा हुआ सुना है वो कहानियों का  शौकीन नही है तुम्हारे साथ तो है पर तुम्हारे साथ का शौकीन नही है वो सुनकर भी तुम्हे  अनसुना करता है अच्छा हुआ वादा दूर का किया है उसने तुम्हे नही  तुम्हारा जिस्म जिया है तुम रोती हो  तो मनाता भी नही अच्छा हुआ तुझे भी तुझ सा मिला अच्छा हुआ तुझसे बात की और चुप भी रहा अच्छा हुआ...!             -अंकेश वर्मा

गज़ल..🍁

इश्क़ के शहर में ग़मों की तेज धार है जाने क्यों सभी को बस इसी का इंतजार है.। उसके आने की अब कोई खबर भी तो न रही हमें फिर क्यों उसी का इज्तिरार-ए-दीदार है.। मिरे गाँव के हालात अब भी तो नही बदले मिरे गाँव मे अब भी  धोवन पाने की कतार है.। हम खुद-ब-खुद चाहते है उसके पैरों का जूठन ये ज़मीर इस कदर सियासत का इख़्तियार है.। ये जिंदगी जो रही बस कुछ दिन की रही मिरा वो कॉलिज ही मिरी ख़ुशी का इख़्तिसार है.। हम दोस्त भी अब पहले से न रहे ये मख़मूर जाने कितने सवालों से मिरा ये दामन दागदार है.। और मिरे वालिद ने भी तो मिरे लिए रखें होंगे रोज़े एक वो ही तो हैं जो मिरे गमगुस्सार हैं..।।                                            -अंकेश वर्मा

नालायक बच्चा...😢

दिन ढलते ही लौटते हैं पक्षी अपने बसेरों की ओर चहचहाहट करते हुए सारे जन भी  लौटते हैं अपने घरों को खुद को आराम देने तब खुद सूरज भी छिपने लगता है  बादलों की आगोश में  क्योंकि वो भी डरता है अंधेरे से तब मेरे भीतर का  इक नालायक बच्चा खोलता है अपनी आँखें जो कुछ नही कर पाता खुद को असहाय पाता है और बस रोता है समाज पर , राजनीति पर , प्रेम पर और कभी-कभी खुद पर भी इस तरह वो बिता देता है रात्रि का एक पहर फिर वो नालायक बच्चा काटता है शहर के चक्कर आवारों की भांति कुछ नया खोजने को कभी दूसरों के भीतर कभी अपने ही बिस्तर के सिराहने कभी उपन्यास की कहानियों में तो कभी खुद की लिखी पंक्तियों में अंततः थक हार सो जाता है वो इक नई रात्रि के दूसरे पहर के इन्तजार में क्योंकि उसे उजाले हकीकत लगते है जो उसे बहुत डराते हैं..!                         - अंकेश वर्मा