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संदेश

समाज

मेरे जन्म से पहले पड़ोसी ने मांगी मेरे भाई के मृत्यु की दुआ जब हम स्कूल गए तब हमें ताश के पत्तो में उलझाया गया जब होस्टल गए तब हुई कोशिश हमें बर्बाद करने की पिता की नौकरी में कइयों ने डाला अड़ंगा कोशिश की गई हमसे हमारी जमीन छीनने की हमारे अच्छे नम्बर आने पर हमें गालियां दी गई हम वंचित रहे अपने कई संवैधानिक अधिकारों से पिता ने फसलें बोई कुछ ने उन्हें जलाया पिता ने संघर्ष किया कुछ सफलताएं मिली जीवन के कई बसन्त के बाद पिता के संघर्षों और उनकी स्नेहिल छाया में हम अपनी समृद्धि को लालायित हुए हुए उत्सुक व्यवस्थाओं को जानने को, समझने को हमने कई सपने देखे, समृद्धि के सपने, खुशहाली के सपने, हमारे सपने सिर्फ हमारे लेकिन पिताजी को संतोष नही था एक दिन यकायक शिक्षा पर बहस के दौरान उनके माथे पर उभरी थी गंभीरता की रेखाएं उन्होंने कहा था - कि तुम्हारी शिक्षा केवल हमारी समृद्धि के लिए नही अपितु आवश्यक है समाज की प्रगति के लिए भी । मैं अवाक था... कौन सा समाज ? किसकी प्रगति ?

क्षणिकाएं...🍁

गनीमत है कि दिन के हर पहर मुझसे अलग-अलग बर्ताव करते हैं... जैसे पक्षी लौट आते हैं अपने बसेरों पर शाम के ढलते ही तुम भी वापस आ जाती हो मेरे ख्वाबों में मेरी शर्तों के साथ.. उजाले कभी भी मेरे साथी नही रहे यही कारण है कि चांदना के पहर से ही तुम मुझसे दूर होने लगती हो... © अंकेश वर्मा

क्षणिकाएं...🍁

बेशक मैं दुनिया का सबसे अच्छा प्रेमी नही हूँ लेकिन आम के पेड़ों पर दोबारा बौर के आने से पहले अगर तुम आये तो ये देखोगे कि मेरा प्रेम तुम्हें बौर की खुश्बू की याद दिलाएगा.. © Ankesh Verma

में प्रेम माँगने आया हूँ...🍁

कुछ प्रेम भरे आलिंगन हैं कुछ विरह के मारे क्रंदन हैं कुछ यादें मीठी-खट्टी हैं कुछ गीली-पीली चिट्ठी हैं भर झोली उनको लाया हूँ मैं प्रेम मांगने आया हूँ.. कुछ सुप्त व्यथा के वन्दन हैं कुछ प्रेम में भीगे चंदन हैं जेबों में मेरे कंगन हैं जो प्रेम-पगे अभिनंदन हैं दुधमुहे प्रेम का साया हूँ मैं प्रेम मांगने आया हूँ पाने को केवल तुम्हें एक मैं हुआ द्रवित वर्षों अनेक बस केवल तेरा रूप देख खो बैठा हूँ अपना विवेक मैं सहज-व्यक्ति भरमाया हूँ मैं प्रेम मांगने आया हूँ । © अंकेश वर्मा

बदनसीब...🍁

ये आलम कुछ यूं है की मन मेरा हैरान है तमाम राहगीरों की अटकी पड़ी जान है बीच पटरी पर पड़ा कटा सर देख रहा न कमरे में रोशनी कोई न कोई रोशनदान है जिन्होंने ज़हान के हिफाज़त की ली थी कसमें बने तमाशबीन हैं , न कोई ईमान है मरने पर मुआवज़े में लाखों का झुनझुना है और तराज़ को मापने को न कोई मीज़ान है ख़ुमारी यूँ है सब पर दहशत की या ख़ुदा चीखों से तरबतर हैं, फिर भी बेजुबान हैं । ©  अंकेश वर्मा 

मृत्यु की अभिलाषा...🍁

शिव बटालवी मानते है की जवानी में मरना  बहुत ज्यादा खूबसूरत है जवानी में या तो प्रेमी मरते हैं या फिर मरते हैं बहुत अच्छे कर्मों वाले जो जवानी में मरते हैं वो या तो फूल बनते हैं  या बनते हैं तारे जवानी में मरना  बुढ़ापे की तंगहाली में मरने से ज्यादा अच्छा है लेकिन मैं बुढ़ापे में मरना चाहता हूँ जब मेरा शरीर मेरा साथ छोड़ने लगे निवाला निगलते समय  अचानक से वो मेरे गले मे फंस जाए और मैं मृत्यु को प्राप्त हो जाऊं  या फिर पोपले मुँह को हिलाते-हिलाते  मेरे जबड़े अकड़ जाएं जो कभी ठीक न हों या शरीर पर मोटी-मोटी नसों के उभरने के बाद  उनमे रक्त दौड़ने से मना कर दे मैं बच्चों को आधी सदी से ज्यादा समय की कहानी सुनाते हुए मरना पसन्द करूँगा या पंछियों को दाना डालते समय ठोकर लगकर गिरते हुए नहाते-नहाते नल पर फिसलकर मरना भी  अनोखा नही तो रोचक जरूर होगा बुढ़ापे में मरना मेरे लिए ताउम्र खुद को आजमाना माना जाए मुझे मृत्यु से भय नही  न ही मुझे मृत्यु का इंतजार है बस मुझे जवानी में मरकर  अपना बुढ़ापा खराब नही करना है । © अंके...

सियासत....🍁

दोस्तों की टोली से आई बुझी एक आवाज भूखों से क्यूँ इतना  कतराती है सरकार क्या वो डरती है  डरती है या छिपा रही है क्षोभ न कुछ कर पाने की या भूली है वो बात  कुछ खोकर पाने की या अपने जैसों को  हजम नही कर सकती या सब कर सकती है  पर नही है करती सरकारें तो बाबा होती हैं ख़ुदा के नेमत से भी  कुछ ज्यादा होती हैं थे मौन सभी मुँह खोले थे एक वृद्ध वहाँ बस बोले थे सरकारें वेश्या होती हैं दिखती नटखट  काम नही पर बिगड़े बोल में मधुशाला है कुर्सी के एक मोह ने उनके दिल पर घूंघट डाला है सरकारें ये ख़ुदा नही हैं सरकारें ये नही हैं जोगन  इनकी अपनी खुद की बंसी  इनका खुद का है वृन्दावन जग ले साथ नही चल सकती  पापों के कोखों में पलती एक यही तो सत्य जगत का बाकी सब कुछ माया है सरकारों का काम पूछने  कौन अभागा आया है । © अंकेश वर्मा