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संदेश

मैं से मानवता तक..🍁

मेरा मन अन्तःगामी है दुःख क्यों मेरा अनुगामी है  बीती यादें भरसक आती संग अपने अंदेशा लाती मैं बुद्ध बना अड़ जाऊँगा बन ठूंठ वहीं गड़ जाऊँगा हैं रातें छिछली सांझ सजर मैं देखूं किंचित भोर निर्झर  सपनों को जो संभाल सकूँ सबके दुख को यदि बाँट सकूँ दे संबल हर वंचित-जन को मैं स्वयं सिद्ध हो जाऊँगा गर ये सब कुछ कर पाया तो मानव हरगिज कहलाऊंगा...।

मधुसूदन...🍁

हे त्रिभुवन प्यारे जग स्वामी हो गए हो कैसे अभिमानी दे दर्शन अपने शीतल छवि का कष्ट हरो सब निर्बल जन का हम भी तुम्हरे चरण पखारें जन-धन सब तुम पर न्यौछारें तुम्हरे दर्शन नयनन सुख दें विरह तुम्हारी सम्बल तोड़ें आये बसो मन ही मन राजा देहु सबय जन प्रेम को धागा रौद्र रूप ले कष्ट निवारो कलयुग के जन-जन को तारो अंधियारों में दीप जलाओ देहु सबय सुख मन हर्षाओ आये बसो घर घर मधुसूदन देखि सरस् होइ जीवन-जीवन.।

सत्ता और हम...🍁

तुम्हारे बाग आज गुलज़ार हैं तुमने सींचे हैं अपने बगीचे हम जैसों के रक्त की बूंदों से तुम्हारी कुर्सी की खातिर बहाये हैं हमने पाले में पसीने तुम्हारी जीत को हमने लाठियां खाई हैं जमीदारों की सत्ता के गलियारों में  तुम्हारी हनक के लिए  हमने झेलें हैं पुलिस के डंडे और पानी की बौछार, इन सबके बावजूद भी  आज हम अपने  अस्तित्व की खोज में हैं हमें भटकना पड़ता है दर-दर ठोकरें खाते हुए अपने परिवार की खातिर  दो जून की रोटी को कभी कभी लगता है तुम्हारा न होना हमारे होने की पहली शर्त है..।

एकाकीपन...🍁

रोड़े बन जाते हैं  मेरे अपने ही हालात रोकते हैं मेरा रास्ता मेरी कस्ती मझधार में है केवल मुझ तक हैं मेरी सांसे  मेरी आहट भी बस मुझे है मेरा मान,मेरा अभिमान  सब मुझमे दफन हैं मेरे स्वप्न एक-एक कर  सिमट गए हैं मेरे ही भीतर इनका अस्तित्व तो है परन्तु असम्भव प्रतीत होता है इनका चरितार्थ होना तौलता हूँ मैं समाज को अपने तर्क की तराजू पर उसकी चीर फाड़ करता हूँ किसी डॉक्टर की भांति और अपने आंसू को बनाता हूँ स्याही कुछ लिखने को ये जरिया बनता जा रहा है मेरी भड़ास निकालने का मेरा खुद का लिखा भी  अब मुझे थकाता है किसी अपने का साथ भी  नही दे पा रहा मुझे मेरे खालीपन से राहत किसी खाली बोतल में कैद आत्मा की तरह मैं सब कुछ महसूस करके भी केवल और केवल मौन हूँ..।

स्त्री विमर्श...🍁

रीति-रिवाज व परंपराएं सदैव धनात्मक नही हो सकती , कहीं न कहीं पर ये मनुष्य के लिए विनाशकारी सिद्ध होती हैं और जब बात स्त्रियों की हो तो समाज रीति-रिवाज , परम्पराओं व नैतिक मूल्यों के नाम पर उनके पैरों पर अपनी कसावट और भी मजबूत कर देता है..। स्वतंत्रता के नजरिये से स्त्री कभी भी अपने आप को शक्तिशाली नही महसूस कर पाई , यही कारण है कि स्त्री को " अंतिम उपनिवेश " की संज्ञा दी जाती है...। वहीं दूसरी ओर अगर ग्रामीण क्षेत्रों की बात करें तो वहाँ के स्त्रियों का मन स्वतंत्रता की आंच से भी भय खाता है..। उनको दी गई स्वतंत्रता के साथ एक अदृश्य भय हमेशा उनके साथ चलता है और अंततः उसका उपभोग भी एक आज्ञापालन ही होता है...। जहाँ स्त्रियों को स्वतंत्रता प्राप्त भी होती है वहाँ पर भी स्त्री-पुरुष संबंध काफी उलझे हुए होते हैं , जैसा कि पश्चिमी देशों में देखने को भी मिलता है...। दरअसल स्वतंत्र पुरूष यह तय नही कर पा रहा है कि स्वतंत्र स्त्री के साथ कैसे पेश आया जाए , वहीं दूसरी ओर अनेको स्त्रियां भी इस बात से अनभिज्ञ हैं कि अपनी स्वतंत्रता का उपभोग कैसे करें..इसलिए वो कभी -कभी अपने लिए...

गज़ल..🍁

उजाड़ गमजदा हयात* में अरमान ढूंढिये अन्ज़* पर मुम्ताज़ सा कोई निगहबान ढूंढिये गर हिज्र ही है आपकी अज़ाब* जान लो अग्यार* में भी अपना मेहमान ढूंढिये ला रही हों कराह जो जवानी की सलवटें  नौजवान सा कोई पासबान* ढूंढिये है यही लोगों का बहिस्त* आज कल एक फ़रामोश कोई मेजबान ढूंढिये तब प्यालों में तमाम उम्र काट दी तुमने  अब ताराज* मापने को मीज़ान* ढूंढिये.। ये गज़लकारी भी अब एक रोज़गार है वाह वाह करने को मेहरबान ढूंढिये..।। हयात*- जिंदगी /  अन्ज़*- धरती हिज्र*- विरह /  अज़ाब*- पीड़ा अग्यार*- अजनबी /  पासबान*- रक्षक बहिस्त*- जन्नत /  ताराज*- बरबादी मीज़ान*- तराजू                            - अंकेश वर्मा

गज़ल..🍁

उसने हमपर रहमत की हम बिखर गए रोका-टोका राह शजर* की बिखर गए.। हुए जुनूनी बस्ती-बस्ती डेरा डाला राह कटीली जंगल घूमे बिखर गए.। उसने की गद्दारी बेशक अपना माना हममे थी खुद्दारी फिर भी बिखर गए.। साथ रहे और उसके दिल पर जुम्बिश* की खुद को दिया अज़ाब* और हम बिखर गए.। उसने उनको अपनाया जिनको चाहा उसकी जीनत उसकी जन्नत हम बिखर गए.। सुना बने वो जिनपर उसने हाथ रखा हम ही एक नाक़ाबिल थे सो बिखर गए.।। शजर*- पेड़ जुम्बिश*- हलचल अज़ाब*- पीड़ा                               - अंकेश वर्मा