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संदेश

बदनसीब...🍁

ये आलम कुछ यूं है की मन मेरा हैरान है तमाम राहगीरों की अटकी पड़ी जान है बीच पटरी पर पड़ा कटा सर देख रहा न कमरे में रोशनी कोई न कोई रोशनदान है जिन्होंने ज़हान के हिफाज़त की ली थी कसमें बने तमाशबीन हैं , न कोई ईमान है मरने पर मुआवज़े में लाखों का झुनझुना है और तराज़ को मापने को न कोई मीज़ान है ख़ुमारी यूँ है सब पर दहशत की या ख़ुदा चीखों से तरबतर हैं, फिर भी बेजुबान हैं । ©  अंकेश वर्मा 

मृत्यु की अभिलाषा...🍁

शिव बटालवी मानते है की जवानी में मरना  बहुत ज्यादा खूबसूरत है जवानी में या तो प्रेमी मरते हैं या फिर मरते हैं बहुत अच्छे कर्मों वाले जो जवानी में मरते हैं वो या तो फूल बनते हैं  या बनते हैं तारे जवानी में मरना  बुढ़ापे की तंगहाली में मरने से ज्यादा अच्छा है लेकिन मैं बुढ़ापे में मरना चाहता हूँ जब मेरा शरीर मेरा साथ छोड़ने लगे निवाला निगलते समय  अचानक से वो मेरे गले मे फंस जाए और मैं मृत्यु को प्राप्त हो जाऊं  या फिर पोपले मुँह को हिलाते-हिलाते  मेरे जबड़े अकड़ जाएं जो कभी ठीक न हों या शरीर पर मोटी-मोटी नसों के उभरने के बाद  उनमे रक्त दौड़ने से मना कर दे मैं बच्चों को आधी सदी से ज्यादा समय की कहानी सुनाते हुए मरना पसन्द करूँगा या पंछियों को दाना डालते समय ठोकर लगकर गिरते हुए नहाते-नहाते नल पर फिसलकर मरना भी  अनोखा नही तो रोचक जरूर होगा बुढ़ापे में मरना मेरे लिए ताउम्र खुद को आजमाना माना जाए मुझे मृत्यु से भय नही  न ही मुझे मृत्यु का इंतजार है बस मुझे जवानी में मरकर  अपना बुढ़ापा खराब नही करना है । © अंके...

सियासत....🍁

दोस्तों की टोली से आई बुझी एक आवाज भूखों से क्यूँ इतना  कतराती है सरकार क्या वो डरती है  डरती है या छिपा रही है क्षोभ न कुछ कर पाने की या भूली है वो बात  कुछ खोकर पाने की या अपने जैसों को  हजम नही कर सकती या सब कर सकती है  पर नही है करती सरकारें तो बाबा होती हैं ख़ुदा के नेमत से भी  कुछ ज्यादा होती हैं थे मौन सभी मुँह खोले थे एक वृद्ध वहाँ बस बोले थे सरकारें वेश्या होती हैं दिखती नटखट  काम नही पर बिगड़े बोल में मधुशाला है कुर्सी के एक मोह ने उनके दिल पर घूंघट डाला है सरकारें ये ख़ुदा नही हैं सरकारें ये नही हैं जोगन  इनकी अपनी खुद की बंसी  इनका खुद का है वृन्दावन जग ले साथ नही चल सकती  पापों के कोखों में पलती एक यही तो सत्य जगत का बाकी सब कुछ माया है सरकारों का काम पूछने  कौन अभागा आया है । © अंकेश वर्मा 

वाजिब सवाल ।। गज़ल

सवाल ये नही है भाई कि सवाल क्या है सवाल ये कि, क्या सवाल होना चाहिए हिन्दू और मुसलमा के नाम पर झगड़े हैं इस बात पर हुक़्मरां से बवाल होना चाहिए तुम काबिल हो नाकाबिल वक्त की बात है तुम्हारे पास कोई एक कमाल होना चाहिए लोग कानून को तोड़ने का हुनर सिखाते हैं पर, देश में कानून का मिशाल होना चाहिए ये मीडिया बलात्कार पर भी जिरह करती है ये हुआ क्यों असल में ये सवाल होना चाहिए दूर गली के कोने में वेश्या फुलझड़ी बनी है वेश्य, वेश्या क्यों है ये मलाल होना चाहिए © अंकेश वर्मा

हे यार जुलाहे...🍁

हे यार जुलाहे संग तेरे  मैं नदी किनारे आऊंगा  तू करते रहना काम वहीं मैं  बंसी मधुर बजाऊंगा बिसुही के तीरे पड़े पड़े हम बिरहा मिलकर गाएंगे कुछ सत्तू होंगे कांदे संग हम खुशी खुशी से खाएंगे कुछ मछली होगी पानी में कुछ नदी किनारे के श्रोते ऊंचे बम्बे से कूद कूद  हम खूब लगाएंगे गोते एक पथिक वहां से गुजरेगा  मल्हार के साथ गुजरने को हम भी चढ़ लेंगे नैया में नदिया के पार उतरने को एक बात बता साथी मेरे  इस नदी किनारे नाते को क्या याद करेगा तू उस पल मुझे देख शहर को जाते को मैं आऊंगा वापस पक्का संग तेरे खूब विचारना है पर तब तक को अलविदा मित्र खाली आँचल भी भरना है बाबा की आंखें सूखी हैं भाई भी होता व्याकुल है कुछ नए सफर का स्वप्न सजा  मन मेरा प्रतिपल आकुल है पर याद रहेगा तो मुझको  देखूंगा तुझको अम्बर में नदिया का पानी उतरेगा  होकर अदृश्य समंदर में तेरे हाथों के कठिन ताप सा मुझको पथ में जलना है तब तक मीलों मुझको मीलों मुझको मीलों चलना है ...। © अंकेश वर्मा

ग़ज़ल...🍁

हमने सींचे थे गुलिस्तां किसी रोज़ को फ़क़त क्या ही पड़ी थी जब मर जाना है इक मंजिल को निकले थे घर से कभी खबर भी न थी कि किधर जाना है गोया कौमी इरादों से हाथ गंदे रहे  इसके हटते ही हमे भी सुधर जाना है  गाँव की याद आते ही वो किस्सा याद आता है जबां पर एक ही रट थी कि शहर जाना है बुलंदी की खोज को भी बस बिखरे रहे कहाँ मालूम था कि बिखर के बिखर जाना है  जो जियेंगे भी तो वो ख़ुदा की नेमत से मर कर भी सबको उधर जाना है । © अंकेश वर्मा

रिश्ते...🍁

सब शिक़वे जायज़ होते हैं, बस किस्से खाली होते हैं । कुछ आते खुद से भरे रंग कुछ करते रहे उजाड़ हमें कुछ रिश्ते खनक चूड़ियों से, कुछ रिश्ते गाली होते हैं सब शिक़वे जायज़ होते हैं बस किस्से खाली होते हैं कुछ की कीमत मधुशाला है, कुछ का आसान हृदयातल है कुछ होते ख़ुदा की नेमत से, कुछ केवल प्याली होते हैं सब शिक़वे जायज़ होते हैं बस किस्से खाली होते हैं । © अंकेश वर्मा