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गजल...🍁

एक तुम ही तो थे मेरे शामो-सहर
तुम गए तो झुकी है लजा कर नजर
संग तुम्हारे ये उपवन था खिलता रहा
बिन तुम्हारे यहाँ जल गए हैं शजर

तुम जो आये तो बहने हवाएँ लगी
संग तुम्हारे थी सारी फजाएँ जगी
तेरी चौखट रही मेरी मंजिल सदा 
बिन तुम्हारे स्वप्न के हुए दर बदर
एक तुम ही तो थे मेरे शामो सहर
तुम गए तो झुकी है लजा के नजर

तुमसे रहती थी गालियां खुशी से भरी
तुमको पाने को उठती नजर सरसरी
बिन तुम्हारे रहा पीर नयनों में भी
झुक गए ये जो आये तुम्हारी खबर
एक तुम ही तो थे मेरे शामो-सहर
तुम गए तो झुकी है लजा के नजर

तुम मिले तो लगा चाँद ही आ गया
चाँदनी सारी मुझको वो पहना गया
तुमसे बिछड़े तो काली घटाएं सजी
तुम गए तो बहे हैं शहर के शहर 
एक तुम ही तो थे मेरे शामो सहर
तुम गए तो झुकी है लजा के नजर..।

© अंकेश वर्मा

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घर मे घर..🍁

कभी बँटवारे  तो कभी घर के  भीतरी दीवारों का द्वन्द कभी अपनी अवहेलना तो कभी पिता की तानाशाही से कभी माँ के साथ को अथवा बहन के भीगे नयनों से या अपनी सत्ता स्थापित करने को कई बार खुद से भी बिगड़ते हैं रिश्ते बच्चे जब बड़े हो जाते है घर मे कई घर हो जाते हैं..!                    - अंकेश वर्मा 

क्षणिकाएं...🍁

गनीमत है कि दिन के हर पहर मुझसे अलग-अलग बर्ताव करते हैं... जैसे पक्षी लौट आते हैं अपने बसेरों पर शाम के ढलते ही तुम भी वापस आ जाती हो मेरे ख्वाबों में मेरी शर्तों के साथ.. उजाले कभी भी मेरे साथी नही रहे यही कारण है कि चांदना के पहर से ही तुम मुझसे दूर होने लगती हो... © अंकेश वर्मा

विफलता २

 कुछ पुण्य न अर्जित किया  कुछ साध्य साधन चुक गए कुछ सुरम्य दिन भी  दीपक किनारे छिप गए देखता हूँ वक्त बीते  मैं कहाँ था सोचता हो जीव कोई मैं उसे गिद्धों समान नोचता स्वयं, स्वयं को देखकर भ्रमित हो जाता हूँ रत्न सारे हारता हूँ...२ x