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वीर शिखंडी के घेरे में...🍁

वीर शिखंडी के घेरे में
सजी चौखटों से उठते कुछ
निष्ठुर पौरुष देखे हैं..।

काल अमर कर निज कर्मों से
व्याध-गान को अपनाने को
खुले केश सी बिंधी जटायें
वचनों-वचनों मर जाने को
सत्ता की भूखों में तपती
लाखों बृहलाएँ देखे हैं
वीर शिखंडी के घेरे में
सजी चौखटों से उठते कुछ
निष्ठुर पौरुष देखे हैं..।

हाथ कटारें तीखी लेकर
सूर्य-तपिश को कर शर्मिंदा
नरमुंडों की सजी थाल से
प्रकट हो रहे मुर्दा-जिंदा
सिंहनाद से गर्जन करते
शौर्य के मंजर देखे हैं
वीर शिखंडी के घेरे में
सजी चौखटों से उठते कुछ
निष्ठुर पौरुष देखें हैं..।

राह सजीली पत्थर बनते
वक्त-वक्त शर्मिंदा करते
जीवन के विकराल समर में
पतित आश की जुगनू बनते
स्याह सी मालिन तलवारों संग
धर्मों के रक्षक देखे हैं
वीर शिखंडी के घेरे में
सजी चौखटों से उठते कुछ
निष्ठुर पौरुष देखें हैं....।

© Ankesh Verma

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घर मे घर..🍁

कभी बँटवारे  तो कभी घर के  भीतरी दीवारों का द्वन्द कभी अपनी अवहेलना तो कभी पिता की तानाशाही से कभी माँ के साथ को अथवा बहन के भीगे नयनों से या अपनी सत्ता स्थापित करने को कई बार खुद से भी बिगड़ते हैं रिश्ते बच्चे जब बड़े हो जाते है घर मे कई घर हो जाते हैं..!                    - अंकेश वर्मा 

ग़ज़ल..🍁

हाथ में हाथ ले साथ चलते हुए जमाने भर की नजरों से संभलते हुए होके तुम में फ़ना मेरी जां सच कहूं तुम्हें चूम ही लूंगा गले मिलते हुए क्या बताऊं तुम कितनी हसीं लग रही  चाँद के करीब से निकलते हुए साथ में मैं रहूं फिर भी दूरी लगे बाँह भर लेना हमको मचलते हुए है हकीकत या है ये सपना कोई ख़्याल आया है यूँ ही टहलते हुए... © Ankesh Verma

क्षणिकाएं...🍁

गनीमत है कि दिन के हर पहर मुझसे अलग-अलग बर्ताव करते हैं... जैसे पक्षी लौट आते हैं अपने बसेरों पर शाम के ढलते ही तुम भी वापस आ जाती हो मेरे ख्वाबों में मेरी शर्तों के साथ.. उजाले कभी भी मेरे साथी नही रहे यही कारण है कि चांदना के पहर से ही तुम मुझसे दूर होने लगती हो... © अंकेश वर्मा