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वक्त तुम्हारा..🍁


अनजाने में अनचाहे से
साथ किसी का मिलता है जब
सूनेपन का कोरा चादर
ओढ़ के सूरज सो जाता है..।

अंधियारे में सड़क किनारे
हाथ पकड़ के चलते जाना
मीठी तीखी बातों के संग
किस्से भी भरमार सुनाना
मिल-मिल कर जज्बात हमारा
खुद ही खुद में घुल जाता है
अनजाने में अनचाहे से
साथ किसी का मिलता है जब
सूनेपन का कोरा चादर
ओढ़ के सूरज सो जाता है..।

रात गए तक बातें करना
दिल को बड़ा हंसाता है
छोटी से छोटी गलती पर
भर कर आंख दिखता है
रिश्तों के उलझे धागों में
मनमर्जी से बिंध जाता है
अनजाने में अनचाहे से
साथ किसी का मिलता है जब
सूनेपन का कोरा चादर
ओढ़ के सूरज सो जाता है..।

उसकी गलती पर हंसता दिल
खुद पर बस खिसियाता है
सावन हो या जेठ दुपहरी
बरखा में खूब नचाता है
चाँद सरीख़ी बातें करता
पलकों में खो जाता है
अनजाने में अनचाहे से
साथ किसी का मिलता है जब
सूनेपन का कोरा चादर
ओढ़ के सूरज सो जाता है..।

बस्ती, गलियां और घरों में
नई उमंगे भर जाती है
तार तार हो मन की पीड़ा
खुशियों के सम्मुख आती है
घनी रात का जुगनू बन कर
पथ भी औचक बन जाता है
अनजाने में अनचाहे से
साथ किसी का मिलता है जब
सूनेपन का कोरा चादर
ओढ़ के सूरज सो जाता है..।

© Ankesh Verma

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ग़ज़ल..🍁

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