सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

अच्छा सुनो....😑

कभी खुद को वक्त के तराजू में रखना
फिर गौर करना
कहीं तुम भी वही तो नही
जिनके तौर-ए-जिंदगी को तुम कोसते हो
तुम्हारे मुस्कान पर हजारों रुसवाईयाँ शर्माती है
पर खुद को इनकी आड़ में कब छिपाओगे
अपने झूठे जज़्बात और उलझे रिश्तों को
खुद से दरकिनार करना
और फिर सोचना
कहीं उसे सब पता तो नही है
बगैर तुम्हारे कुछ भी बताए
नवीनता हमेशा उल्लास लाती है मगर
पुराने घर के प्यार को झुठलाया नही जाता
इसलिए निपट अकेले हो जिस क्षण
तब खुद के भीतर झाँकना
और फिर महसूस करना
कहीं दुनिया को खुद में समेटने के चक्कर में
तुम अकेले तो नही होते जा रहे 
रिश्तों का बनावटीपन ज़ेहन में रखना
ये छिपकर भी आँखो से ओझल नही होता
ये अलग बात है कि
किसी को उसे देखना नही होता
अपने ख़्यालों के पन्ने पलटना
और फिर देखना
वो जो सिर्फ तुम्हारे थे 
जिन पर सिर्फ तुम्हारा अधिकार था
एक-एक कर तुमसे दूर क्यों चले गए..!

                         - अंकेश वर्मा

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

घर मे घर..🍁

कभी बँटवारे  तो कभी घर के  भीतरी दीवारों का द्वन्द कभी अपनी अवहेलना तो कभी पिता की तानाशाही से कभी माँ के साथ को अथवा बहन के भीगे नयनों से या अपनी सत्ता स्थापित करने को कई बार खुद से भी बिगड़ते हैं रिश्ते बच्चे जब बड़े हो जाते है घर मे कई घर हो जाते हैं..!                    - अंकेश वर्मा 

ग़ज़ल..🍁

हाथ में हाथ ले साथ चलते हुए जमाने भर की नजरों से संभलते हुए होके तुम में फ़ना मेरी जां सच कहूं तुम्हें चूम ही लूंगा गले मिलते हुए क्या बताऊं तुम कितनी हसीं लग रही  चाँद के करीब से निकलते हुए साथ में मैं रहूं फिर भी दूरी लगे बाँह भर लेना हमको मचलते हुए है हकीकत या है ये सपना कोई ख़्याल आया है यूँ ही टहलते हुए... © Ankesh Verma

में प्रेम माँगने आया हूँ...🍁

कुछ प्रेम भरे आलिंगन हैं कुछ विरह के मारे क्रंदन हैं कुछ यादें मीठी-खट्टी हैं कुछ गीली-पीली चिट्ठी हैं भर झोली उनको लाया हूँ मैं प्रेम मांगने आया हूँ.. कुछ सुप्त व्यथा के वन्दन हैं कुछ प्रेम में भीगे चंदन हैं जेबों में मेरे कंगन हैं जो प्रेम-पगे अभिनंदन हैं दुधमुहे प्रेम का साया हूँ मैं प्रेम मांगने आया हूँ पाने को केवल तुम्हें एक मैं हुआ द्रवित वर्षों अनेक बस केवल तेरा रूप देख खो बैठा हूँ अपना विवेक मैं सहज-व्यक्ति भरमाया हूँ मैं प्रेम मांगने आया हूँ । © अंकेश वर्मा