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नजरिया...🍁

नीति -अनीति के द्वंद्व में 
मन शंकित हो जाता है
भला जुए के खेल में भी 
कौन नीति को रखता है
शकुनि ने टेढ़ी चल चली
तो युधिष्ठिर को हट जाना था
छोड़ जुए का खेल उन्हें 
उस संगत से उठ जाना था
यदि गलत थे कौरव 
तो कौन युधिष्ठिर  
उचित ही करते जाते थे
राज्य मोह में भाई-पत्नी 
तक को रखते जाते थे
गर नीति स्वरूप सब भाई पर 
युधिष्ठिर का हक बनता था
तो नीति दृष्टि से भाई की 
रक्षा का दायित्व भी पड़ता था
सत्य और नीति के पथप्रदर्शक 
भाई-पत्नी के जंगी थे
यदि कौरव अनीति के साधक थे
तो युधिष्ठिर भी उनके संगी थे..!

                 - अंकेश वर्मा

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घर मे घर..🍁

कभी बँटवारे  तो कभी घर के  भीतरी दीवारों का द्वन्द कभी अपनी अवहेलना तो कभी पिता की तानाशाही से कभी माँ के साथ को अथवा बहन के भीगे नयनों से या अपनी सत्ता स्थापित करने को कई बार खुद से भी बिगड़ते हैं रिश्ते बच्चे जब बड़े हो जाते है घर मे कई घर हो जाते हैं..!                    - अंकेश वर्मा 

ग़ज़ल..🍁

हाथ में हाथ ले साथ चलते हुए जमाने भर की नजरों से संभलते हुए होके तुम में फ़ना मेरी जां सच कहूं तुम्हें चूम ही लूंगा गले मिलते हुए क्या बताऊं तुम कितनी हसीं लग रही  चाँद के करीब से निकलते हुए साथ में मैं रहूं फिर भी दूरी लगे बाँह भर लेना हमको मचलते हुए है हकीकत या है ये सपना कोई ख़्याल आया है यूँ ही टहलते हुए... © Ankesh Verma

में प्रेम माँगने आया हूँ...🍁

कुछ प्रेम भरे आलिंगन हैं कुछ विरह के मारे क्रंदन हैं कुछ यादें मीठी-खट्टी हैं कुछ गीली-पीली चिट्ठी हैं भर झोली उनको लाया हूँ मैं प्रेम मांगने आया हूँ.. कुछ सुप्त व्यथा के वन्दन हैं कुछ प्रेम में भीगे चंदन हैं जेबों में मेरे कंगन हैं जो प्रेम-पगे अभिनंदन हैं दुधमुहे प्रेम का साया हूँ मैं प्रेम मांगने आया हूँ पाने को केवल तुम्हें एक मैं हुआ द्रवित वर्षों अनेक बस केवल तेरा रूप देख खो बैठा हूँ अपना विवेक मैं सहज-व्यक्ति भरमाया हूँ मैं प्रेम मांगने आया हूँ । © अंकेश वर्मा