सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

गज़ल..🍁


तुमसे मिलना और बिछड़ना अल्लाह ख़ैर
कैसे हो दिन रात संवरना.? अल्लाह ख़ैर.।

तुमसे भी मिल बस खुद से ही बातें की हैं
तुम संग है हालात सुधारना.? अल्लाह ख़ैर.।

तनी हुई तलवार हमारी गर्दन पर है
अब भी है हालात बिगड़ना.? अल्लाह ख़ैर.।

इक-इक कर खो गए यहाँ मनसूब हमारे
खामोशी संग राह विचरना अल्लाह ख़ैर.।

तुमसे बिछड़े हुआ है अरसा मौला जाने
पर अब भी है रात जगन्ना अल्लाह ख़ैर..।।

मनसूब*- संबंधित

जगन्ना*- जागना

                                  -अंकेश वर्मा

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

घर मे घर..🍁

कभी बँटवारे  तो कभी घर के  भीतरी दीवारों का द्वन्द कभी अपनी अवहेलना तो कभी पिता की तानाशाही से कभी माँ के साथ को अथवा बहन के भीगे नयनों से या अपनी सत्ता स्थापित करने को कई बार खुद से भी बिगड़ते हैं रिश्ते बच्चे जब बड़े हो जाते है घर मे कई घर हो जाते हैं..!                    - अंकेश वर्मा 

क्षणिकाएं...🍁

गनीमत है कि दिन के हर पहर मुझसे अलग-अलग बर्ताव करते हैं... जैसे पक्षी लौट आते हैं अपने बसेरों पर शाम के ढलते ही तुम भी वापस आ जाती हो मेरे ख्वाबों में मेरी शर्तों के साथ.. उजाले कभी भी मेरे साथी नही रहे यही कारण है कि चांदना के पहर से ही तुम मुझसे दूर होने लगती हो... © अंकेश वर्मा

विफलता २

 कुछ पुण्य न अर्जित किया  कुछ साध्य साधन चुक गए कुछ सुरम्य दिन भी  दीपक किनारे छिप गए देखता हूँ वक्त बीते  मैं कहाँ था सोचता हो जीव कोई मैं उसे गिद्धों समान नोचता स्वयं, स्वयं को देखकर भ्रमित हो जाता हूँ रत्न सारे हारता हूँ...२ x